अखिलेश यादव का ‘100 विधायक लाओ, सीएम बन जाओ’ बयान गरमाया यूपी का सियासी पारा
अखिलेश यादव के उस बयान पर, जिसमें उन्होंने 100 विधायकों को लाने वाले किसी भी व्यक्ति को एक सप्ताह के लिए मुख्यमंत्री पद देने की पेशकश की थी, उत्तर प्रदेश में भाजपा नेताओं की ओर से तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं।
उत्तर प्रदेश में आने वाले पंचायत और विधानसभा चुनावों को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। बीजेपी और समाजवादी पार्टी समेत सभी दल अपनी-अपनी रणनीति बनाने में जुटे हैं। इसी बीच सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने लखनऊ स्थित पार्टी दफ्तर में एक बड़ा बयान देकर सियासी हलचल बढ़ा दी। उन्होंने यूपी सरकार के दोनों डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य और बृजेश पाठक को खुला ऑफर देते हुए कहा, “100 विधायक लाओ और मुख्यमंत्री बन जाओ। जो 100 विधायक साथ लाएगा, वह एक हफ्ते के लिए मुख्यमंत्री बनेगा।” इस बयान को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के जापान और सिंगापुर दौरे से जोड़कर देखा जा रहा है।
बीजेपी का पलटवार
अखिलेश का बयान वायरल होते ही बीजेपी नेताओं ने तीखी प्रतिक्रिया दी। जर्मनी दौरे पर रवाना होने से पहले केशव प्रसाद मौर्य ने कहा कि समाजवादी पार्टी में बीजेपी से कोई आने वाला नहीं है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि अखिलेश अपने विधायकों को बचा लें तो बड़ी बात होगी। इससे पहले मौर्य ने सोशल मीडिया पर लिखा था कि गुंडई की राजनीति की विरासत ज्यादा लंबी नहीं चलती। बीजेपी प्रवक्ता मनीष शुक्ला ने भी बयान को राजनीतिक हताशा बताया। उन्होंने कहा कि सपा प्रमुख अब राजनेता कम और पोगो चैनल के किरदार ज्यादा लगते हैं। उनके मुताबिक जनता अब उन्हें गंभीरता से नहीं लेती।
अन्य नेताओं ने भी साधा निशाना
बीजेपी नेता आरपी सिंह ने कहा कि 100 विधायक लाकर एक हफ्ते के लिए मुख्यमंत्री बनाने की बात लोकतंत्र का मजाक है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि अखिलेश “मुंगेरी लाल के हसीन सपने” देख रहे हैं। वहीं यूपी सरकार के मंत्री और निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय निषाद ने बिना नाम लिए कहा कि राजनीति अखाड़े की तरह है, जहां अपने दम पर लड़ना पड़ता है। उन्होंने कहा कि मुलायम सिंह यादव खुद संगठन खड़ा करते थे, लेकिन भाड़े के पहलवान से जीत नहीं मिलती।
पुरानी नोंकझोंक का इतिहास
अखिलेश यादव और केशव मौर्य के बीच पहले भी तीखी बहस हो चुकी है। वर्ष 2022 में विधानसभा सत्र के दौरान दोनों के बीच जोरदार नोकझोंक हुई थी। मामला इतना बढ़ गया था कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को हस्तक्षेप करना पड़ा था। उस विवाद के बाद सदन की कार्यवाही भी प्रभावित हुई थी।
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