300 साल पुरानी परंपरा… शाहजहांपुर में होली पर निकलते हैं लाट साहब, अंग्रेजों के चापलूस नवाब से जुड़ी है हैरान कर देने वाली कहानी
उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में होली के दिन अनोखी लाट साहब परंपरा निभाई जाती है, जहां भैंसा गाड़ी पर बैठे शख्स पर जूते-चप्पल फेंके जाते हैं। 300 साल पुरानी यह परंपरा इतिहास, विरोध और प्रतीकात्मक आक्रोश से जुड़ी है और आज भी कड़ी सुरक्षा के बीच निकाली जाती है।
Uttar Pradesh News: उत्तर प्रदेश का शाहजहांपुर शहर क्रांतिकारियों की विरासत के लिए जाना जाता है। यही वह धरती है जहां राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला ख़ां और ठाकुर रोशन सिंह की यादें आज भी जीवित हैं। लेकिन होली के दिन यही शहर एक अनोखी परंपरा के कारण पूरे देश में चर्चा में आ जाता है। यहां रंग और गुलाल की जगह जूते-चप्पलों से होली खेली जाती है। यह सुनकर भले ही अजीब लगे, लेकिन शाहजहांपुर की विश्व प्रसिद्ध लाट साहब परंपरा करीब 300 साल से चली आ रही है और आज भी उसी जोश के साथ निभाई जाती है।
इतिहास और आक्रोश से जुड़ी परंपरा
होली की सुबह जब देशभर में लोग रंगों में डूबे होते हैं, तब शाहजहांपुर की सड़कों पर हजारों लोग जमा होते हैं। भैंसा गाड़ी पर बैठे लाट साहब पर भीड़ जूते-चप्पल बरसाती है और नारे लगाती है। वरिष्ठ इतिहासकार डॉ. एनसी मेहरोत्रा की पुस्तक के अनुसार इस परंपरा की शुरुआत 1746 में किले के आखिरी नवाब अब्दुल्ला खान के समय मानी जाती है। कहा जाता है कि होली पर नवाब किले से बाहर निकलते थे और तभी नवाब साहब निकल आए का नारा लगा। 1857 की क्रांति के बाद लोगों में आक्रोश बढ़ा और 1859 की होली में नवाबों को बेइज्जत कर विरोध जताया गया। यही विरोध आगे चलकर लाट साहब जुलूस बन गया।
हाथी-घोड़े से भैंसा गाड़ी तक का सफर
पहले यह जुलूस हाथी-घोड़ों पर निकलता था, लेकिन आपत्तियों के बाद ऊंची सवारी पर रोक लगा दी गई और भैंसा गाड़ी का इस्तेमाल शुरू हुआ। 1988 में तत्कालीन जिलाधिकारी कपिल देव ने नवाब का नाम बदलकर लाट साहब कर दिया। अंग्रेज गवर्नरों के प्रतीक के रूप में लाट साहब को हेलमेट और बॉडी प्रोटेक्टर पहनाया जाता है। लगभग 8 किलोमीटर लंबा जुलूस कड़ी सुरक्षा में निकाला जाता है।
प्रशासन की सख्ती और अलग-अलग जुलूस
जुलूस से पहले चौक कोतवाली में बड़े लाट साहब कोतवाल से सालभर का लेखा-जोखा मांगते हैं। नजराने में नकद राशि और शराब की बोतल दी जाती है। इसके बाद प्रशासन जुलूस को अपने नियंत्रण में ले लेता है। ड्रोन कैमरे, पीएसी और रैपिड एक्शन फोर्स की तैनाती की जाती है। बताया जाता है कि यह जुलूस UPSC के ट्रेनिंग मॉड्यूल में केस स्टडी के रूप में शामिल है। शहर के अलग-अलग इलाकों से बड़े और छोटे लाट साहब निकलते हैं। कहीं भैंसा गाड़ी तो कहीं गधे पर सवारी होती है। खुदागंज में यह परंपरा रंग पंचमी तक चलती है। 2018 के बाद नारों में बदलाव आया है, लेकिन जूतों की परंपरा आज भी कायम है। यह परंपरा विरोध का प्रतीक है या परंपरा का उत्सव, इस पर बहस हो सकती है, लेकिन शाहजहांपुर की यह होली दुनिया में बेमिसाल मानी जाती है।
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