CJP के प्रदर्शन के बीच CJI सूर्यकांत का बड़ा बयान, 18 साल से कम उम्र के बच्चों को सजा नहीं, सुधार का मिले मौका, जस्टिस नागरत्ना ने भी दी अहम सलाह
CJP के प्रदर्शन के बीच भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने नाबालिगों से जुड़े मामलों में सुधार और पुनर्वास पर जोर दिया। किशोर न्याय अधिनियम, 2015 के दस साल पूरे होने पर सुप्रीम कोर्ट में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि कानून के दायरे में आए बच्चों की बात सुनने के साथ उनकी परिस्थितियों को समझना भी जरूरी है। उन्होंने काउंसलिंग, प्रोबेशन और सामुदायिक सेवा जैसे विकल्पों तथा संस्थागत देखभाल को अंतिम विकल्प मानने की सोच पर जोर दिया।
भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने नाबालिगों से जुड़े मामलों में सजा के बजाय सुधार और पुनर्वास पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि कानून के दायरे में आए बच्चों की बात सिर्फ सुनी नहीं जानी चाहिए, बल्कि उनकी परिस्थितियों को समझना भी जरूरी है। कई बच्चे पुलिस या अधिकारियों के सामने अपनी बात ठीक से नहीं रख पाते। ऐसे में न्याय व्यवस्था की जिम्मेदारी है कि वह उनके हालात को समझकर फैसला ले। जस्टिस सूर्यकांत ने शनिवार, 10 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में किशोर न्याय अधिनियम, 2015 के दस साल पूरे होने पर आयोजित राष्ट्रीय परामर्श कार्यक्रम में ये बातें कहीं। यह कार्यक्रम सुप्रीम कोर्ट की किशोर न्याय समिति और यूनिसेफ इंडिया के सहयोग से आयोजित किया गया था। इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट की जज जस्टिस बीवी नागरत्ना ने भी बच्चों की चिंताओं को समझने और उनके पुनर्वास पर ध्यान देने की जरूरत बताई। यह चर्चा ऐसे समय में हुई है, जब CJP के प्रदर्शन को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट और पुलिस की कार्रवाई चर्चा में रही है।
सजा नहीं, सुधार और पुनर्वास पर जोर
जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि कानून के दायरे में आने वाला बच्चा कई बार कुछ समय पहले तक ऐसा बच्चा रहा होता है, जिसे देखभाल और सुरक्षा की जरूरत थी। अगर समय रहते उसकी परेशानी को पहचाना जाता, तो शायद स्थिति यहां तक नहीं पहुंचती। इसलिए ऐसे बच्चों से निपटते समय उनके हालात और पृष्ठभूमि को ध्यान में रखना जरूरी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि किशोर न्याय व्यवस्था का उद्देश्य केवल सजा देना नहीं, बल्कि बच्चे को सुधार का अवसर देना भी है। इसके लिए काउंसलिंग, प्रोबेशन और सामुदायिक सेवा जैसे विकल्पों को महत्व दिया जाता है। संस्थागत देखभाल को भी अंतिम विकल्प के रूप में देखा जाना चाहिए। कानून की इस सोच का मकसद है कि किसी गलती के कारण बच्चे का पूरा भविष्य खत्म न हो जाए। उचित मार्गदर्शन और पुनर्वास के जरिए उसे दोबारा शिक्षा, परिवार और समाज से जोड़ने का प्रयास किया जाए।
18 साल से कम उम्र के सभी बच्चों पर एक जैसा नियम नहीं
किशोर न्याय अधिनियम के तहत 18 साल से कम उम्र के व्यक्ति को बच्चा माना जाता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि हर मामले में कानूनी प्रक्रिया एक जैसी होगी। कानून में 16 से 18 साल की उम्र के बच्चों पर जघन्य अपराधों के आरोप होने पर कुछ विशेष परिस्थितियों में प्रारंभिक आकलन के बाद वयस्क के तौर पर मुकदमा चलाने का प्रावधान भी है। इसलिए नाबालिगों से जुड़े मामलों में उनकी उम्र, परिस्थितियों और अपराध की प्रकृति को ध्यान में रखना जरूरी है। जस्टिस सूर्यकांत की टिप्पणी का मुख्य जोर इस बात पर था कि कानूनी प्रक्रिया के दौरान बच्चे की पहचान केवल उसके कथित अपराध से तय नहीं होनी चाहिए और सुधार की संभावना को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
बच्चों की बात सुनना ही नहीं, उन्हें समझना भी जरूरी
जस्टिस सूर्यकांत ने इस बात पर जोर दिया कि बच्चे अक्सर पुलिस या किसी अधिकारी के सामने अपनी बात प्रभावी ढंग से नहीं रख पाते। उनकी चुप्पी या अपनी परेशानी समझाने में असमर्थता को इस तरह नहीं देखना चाहिए कि उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं है। ऐसे मामलों में बच्चों के साथ संवेदनशील व्यवहार, कानूनी सहायता और उचित मार्गदर्शन जरूरी हैं। न्यायिक प्रक्रिया के दौरान उन्हें अपनी बात रखने का अवसर मिलना चाहिए, ताकि उनके बारे में फैसला करते समय उनकी परिस्थितियों को भी समझा जा सके। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि किसी बच्चे को कानून के दायरे में आने के बाद स्थायी रूप से अपराधी की पहचान दे देना उसके भविष्य को प्रभावित कर सकता है। सुधार और पुनर्वास का उद्देश्य यही है कि बच्चा अपनी पिछली गलती से आगे बढ़कर समाज में सकारात्मक भूमिका निभा सके।
जस्टिस नागरत्ना बोलीं- बच्चों की चिंताओं को नजरअंदाज नहीं कर सकते
सुप्रीम कोर्ट की जज जस्टिस बीवी नागरत्ना ने भी कार्यक्रम में बच्चों के प्रति बड़ों की जिम्मेदारी पर जोर दिया। वह सुप्रीम कोर्ट की किशोर न्याय समिति की अध्यक्ष हैं। उन्होंने कहा कि बच्चों की चिंताओं को अनदेखा करने से उनमें अलग-थलग पड़ने और ठुकराए जाने की भावना पैदा हो सकती है। जस्टिस नागरत्ना के मुताबिक, समाज और बड़ों की असली पहचान इस बात से होती है कि वे बच्चों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। उन्होंने बच्चों की परेशानियों को सामूहिक जिम्मेदारी बताते हुए कहा कि उनकी समस्याओं को समझना और उनका समाधान करना जरूरी है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि कानून और नीतियां बना देना ही पर्याप्त नहीं है। असली चुनौती यह है कि बच्चों की देखभाल, सुरक्षा और पुनर्वास के लिए तय व्यवस्था जमीन पर कितनी प्रभावी ढंग से काम कर रही है।
किशोर न्याय अधिनियम के दस साल पूरे
किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 को लागू हुए दस साल पूरे हो गए हैं। इस मौके पर आयोजित राष्ट्रीय परामर्श कार्यक्रम में न्यायपालिका, सरकारी अधिकारियों और बाल अधिकारों से जुड़े विशेषज्ञों ने कानून के क्रियान्वयन, चुनौतियों और आने वाले वर्षों की प्राथमिकताओं पर चर्चा की। इस कानून का उद्देश्य कानून के दायरे में आए बच्चों और देखभाल-सुरक्षा की जरूरत वाले बच्चों के लिए एक ऐसी व्यवस्था बनाना है, जिसमें उनके अधिकारों, सुरक्षा और भविष्य को महत्व मिले। कार्यक्रम में इस बात पर भी जोर दिया गया कि बच्चों को केवल मामलों की फाइल या आंकड़े के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस नागरत्ना की टिप्पणियों का व्यापक संदेश यही है कि किशोर न्याय व्यवस्था में जवाबदेही के साथ संवेदनशीलता भी जरूरी है। बच्चे से हुई गलती को नजरअंदाज किए बिना उसके सुधार, पुनर्वास और समाज में दोबारा शामिल होने की संभावना बनाए रखना इस व्यवस्था की अहम जिम्मेदारी है।
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