राजनीति करनी है तो खुलकर मैदान में आएं… शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को ओपी राजभर की दो टूक सलाह
मौनी अमावस्या विवाद के बीच, एसबीएसपी प्रमुख ओपी राजभर ने सुझाव दिया है कि यदि शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद राजनीति में आना चाहते हैं तो उन्हें खुले तौर पर किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाना चाहिए।
Uttar Pradesh News: उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर बयानबाज़ी तेज हो गई है। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के प्रमुख ओपी राजभर ने शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को लेकर बड़ा बयान दिया है। शनिवार को अलीगढ़ में मीडिया से बातचीत के दौरान ओपी राजभर ने साफ कहा कि अगर शंकराचार्य राजनीति करना चाहते हैं तो उन्हें खुलकर मैदान में आना चाहिए। राजभर ने कहा कि धर्मगुरुओं को परोक्ष राजनीति करने के बजाय किसी राजनीतिक दल में शामिल होकर सीधे जनता के बीच जाना चाहिए। उनके इस बयान के बाद राजनीतिक और धार्मिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है।
राजनीति करनी है तो पार्टी जॉइन करें- राजभर
ओपी राजभर ने कहा कि अगर शंकराचार्य को राजनीति में रुचि है तो उन्हें जो भी पार्टी पसंद हो, उसे जॉइन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि पार्टी का झंडा और डंडा लेकर जनता के बीच जाएं और चुनावी राजनीति करें। राजभर ने यह भी कहा कि साधु-संतों को इस तरह की राजनीति शोभा नहीं देती। उन्होंने मौनी अमावस्या से जुड़े हालिया विवाद का जिक्र करते हुए कहा कि महात्माओं का काम समाज को जोड़ना होता है, न कि राजनीतिक ध्रुवीकरण करना।
साधु-संत विपक्ष की भूमिका में नहीं हों- ओपी राजभर
एक मीडिया चैनल से बातचीत में ओपी राजभर ने कहा कि साधु-संतों का काम समाज में भाईचारा फैलाना और शांति बनाए रखना है। उन्होंने आरोप लगाया कि शंकराचार्य आजकल धर्मगुरु की बजाय विपक्ष की भूमिका निभा रहे हैं। राजभर ने कहा कि कोई भी धर्म आपसी बैर और नफरत नहीं सिखाता, लेकिन जिस तरह मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के खिलाफ बयान दिए जा रहे हैं, वह उचित नहीं है।
मौनी अमावस्या विवाद से जुड़ा है मामला
गौरतलब है कि 18 जनवरी को मौनी अमावस्या के दिन शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद पालकी पर सवार होकर स्नान के लिए जा रहे थे, तभी पुलिस ने उनकी पालकी रोक दी थी। इस दौरान उनके शिष्यों और पुलिस के बीच धक्का-मुक्की हुई थी। इससे नाराज होकर शंकराचार्य उसी स्थान पर धरने पर बैठ गए थे, जहां पुलिस उन्हें छोड़कर गई थी।
11 दिन धरने के बाद वाराणसी लौटे शंकराचार्य
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद माघ मेले में अपनी मांगों को लेकर 11 दिनों तक धरने पर बैठे रहे। इसके बाद 28 जनवरी को वह प्रयागराज छोड़कर वाराणसी स्थित अपने मठ चले गए। आज माघी पूर्णिमा के दिन भी वह प्रयागराज में मौजूद नहीं हैं। इस पूरे घटनाक्रम को लेकर अब सियासी बयानबाज़ी तेज होती नजर आ रही है।
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