ममता बनर्जी अब मुख्यमंत्री नहीं… विधानसभा भंग होने के बाद पश्चिम बंगाल में बड़ा संवैधानिक संकट, आखिर किसके हाथ में है राज्य की कमान?
West Bengal Political: पश्चिम बंगाल में विधानसभा भंग होने के बाद ममता बनर्जी की संवैधानिक स्थिति बदल गई है। नई सरकार के शपथ से पहले राज्यपाल की निगरानी में प्रशासन चल रहा है। यह राष्ट्रपति शासन नहीं है, बल्कि एक अंतरिम संवैधानिक स्थिति है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस समय एक बड़ा संवैधानिक सवाल खड़ा हो गया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस्तीफा नहीं दिया है, लेकिन राज्यपाल द्वारा विधानसभा भंग किए जाने के बाद उनकी स्थिति बदल गई है। अब वे संवैधानिक रूप से मुख्यमंत्री नहीं मानी जा रही हैं। इसी बीच भाजपा की नई सरकार का शपथ ग्रहण 9 मई को प्रस्तावित है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब पुरानी सरकार प्रभावी नहीं रही और नई सरकार ने अभी शपथ नहीं ली, तो राज्य की कमान आखिर किसके पास है और फैसले कौन ले रहा है?
विधानसभा भंग होने का मतलब क्या है
कानूनी विशेषज्ञ अश्वनी कुमार दुबे के अनुसार, किसी भी राज्य विधानसभा का कार्यकाल पहली बैठक से पांच साल तक होता है, जैसा कि संविधान के अनुच्छेद 172 में लिखा है। जब विधानसभा भंग हो जाती है, तो उसके प्रति जवाबदेह मंत्रिपरिषद का आधार भी खत्म हो जाता है। यानी सरकार की वैधानिक स्थिति कमजोर हो जाती है।
क्या इस्तीफा न देने से CM बने रह सकते हैं?
सीधे शब्दों में जवाब नहीं है। मुख्यमंत्री का पद संविधान और बहुमत पर आधारित होता है। अनुच्छेद 164 के अनुसार, मुख्यमंत्री तभी तक पद पर रहता है, जब तक उसे सदन का समर्थन हासिल हो। जब सदन ही नहीं है या बहुमत की स्थिति बदल गई है, तो सिर्फ इस्तीफा न देने से पद पर बने रहना संभव नहीं होता।
इस बीच राज्य की कमान किसके पास होती है
जब पुरानी सरकार समाप्त हो जाती है और नई सरकार ने शपथ नहीं ली होती, तब एक अंतरिम स्थिति बनती है। इस दौरान प्रशासन पूरी तरह बंद नहीं होता। सरकारी दफ्तर चलते रहते हैं, अधिकारी काम करते हैं और कानून-व्यवस्था बनी रहती है। इस समय राज्यपाल की भूमिका बढ़ जाती है, जो प्रशासनिक निरंतरता बनाए रखते हैं।
क्या यह राष्ट्रपति शासन है?
नहीं, यह राष्ट्रपति शासन नहीं है। राष्ट्रपति शासन अनुच्छेद 356 के तहत लागू होता है, जिसके लिए अलग प्रक्रिया होती है। यहां मामला केवल सरकार बदलने के बीच का छोटा अंतराल है, जिसे सामान्य संवैधानिक प्रक्रिया माना जाता है।
संक्रमण काल में क्या फैसले नहीं लिए जाते
इस दौरान बड़े फैसले नहीं लिए जाते। जैसे नई नीतियां, बड़ी नियुक्तियां या भारी खर्च के फैसले टाले जाते हैं। केवल जरूरी काम जैसे कानून-व्यवस्था, अस्पताल, बिजली-पानी और वेतन-पेंशन जैसे कार्य ही जारी रहते हैं।
राज्यपाल की अहम भूमिका
इस स्थिति में राज्यपाल संवैधानिक प्रमुख के रूप में काम करते हैं। वे यह सुनिश्चित करते हैं कि नई सरकार का गठन सही तरीके से हो और प्रशासन में कोई रुकावट न आए। वे बहुमत वाले दल के नेता को सरकार बनाने के लिए बुलाते हैं और शपथ ग्रहण तक व्यवस्था संभालते हैं।
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