भारत का वो प्रधानमंत्री, जिसे भारत के साथ पाकिस्तान ने भी दिया अपना सर्वोच्च सम्मान, कहानी उस मोरारजी देसाई की, जो इंदिरा गांधी को कहते थे गूंगी गुड़िया 

मोरारजी देसाई भारत के चौथे प्रधानमंत्री और देश में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार के प्रमुख थे। 29 फरवरी 1896 को गुजरात के भदेली गांव में जन्मे देसाई ने प्रशासनिक सेवा छोड़कर स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया और आगे चलकर बॉम्बे राज्य के मुख्यमंत्री, केंद्रीय वित्त मंत्री तथा उपप्रधानमंत्री बने। 1977 में जनता पार्टी की जीत के बाद वह प्रधानमंत्री बने, लेकिन जनता पार्टी के भीतर मतभेदों के कारण 1979 में उन्हें पद छोड़ना पड़ा। मोरारजी देसाई को 1991 में भारत रत्न मिला था। इससे पहले उन्हें पाकिस्तान के सर्वोच्च नागरिक सम्मान निशान-ए-पाकिस्तान से भी सम्मानित किया गया था।

Oct 25, 2026 - 21:39
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भारत का वो प्रधानमंत्री, जिसे भारत के साथ पाकिस्तान ने भी दिया अपना सर्वोच्च सम्मान, कहानी उस मोरारजी देसाई की, जो इंदिरा गांधी को कहते थे गूंगी गुड़िया 

भारतीय राजनीति में मोरारजी देसाई का नाम उन नेताओं में लिया जाता है, जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर देश के सर्वोच्च पद तक का सफर तय किया। वह भारत के चौथे प्रधानमंत्री और देश में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार के मुखिया थे। 1977 से 1979 तक प्रधानमंत्री रहे मोरारजी देसाई को भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न के साथ पाकिस्तान के सर्वोच्च नागरिक सम्मान निशान-ए-पाकिस्तान से भी नवाजा गया। यही सम्मान आज भी उनके राजनीतिक जीवन के सबसे चर्चित पहलुओं में शामिल है। उनके पाकिस्तान से संबंधों को लेकर कई तरह की चर्चाएं होती रही हैं। इनमें पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम और भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ के नेटवर्क से जुड़ी कहानियां भी शामिल हैं। हालांकि, इन दावों के सभी पहलुओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि मोरारजी देसाई को पाकिस्तान का सर्वोच्च सम्मान क्यों दिया गया और उनके राजनीतिक जीवन की वे कौन-सी घटनाएं थीं, जिन्होंने उन्हें भारतीय राजनीति में अलग पहचान दिलाई।

गुजरात में जन्म, प्रशासनिक नौकरी छोड़ स्वतंत्रता आंदोलन में आए
मोरारजी देसाई का जन्म 29 फरवरी 1896 को गुजरात के भदेली गांव में हुआ था। उनके पिता शिक्षक थे। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने तत्कालीन बॉम्बे प्रेसीडेंसी की प्रशासनिक सेवा में काम किया और करीब 12 साल तक डिप्टी कलेक्टर के पद पर रहे। 1930 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वतंत्रता आंदोलन तेज हुआ तो देसाई ने सरकारी नौकरी छोड़कर आजादी की लड़ाई में शामिल होने का फैसला किया। इस दौरान वह कांग्रेस से जुड़े और कई बार जेल भी गए। स्वतंत्रता आंदोलन के अनुभव ने उनके राजनीतिक जीवन की दिशा तय की। आजादी के बाद उन्होंने बॉम्बे राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आगे चलकर वह राज्य के मुख्यमंत्री बने और केंद्र सरकार में वित्त मंत्री तथा उपप्रधानमंत्री जैसे पदों पर भी रहे। उनकी प्रशासनिक शैली और स्पष्ट विचारों के कारण उन्हें पार्टी के भीतर एक प्रभावशाली नेता माना जाता था।

नेहरू और शास्त्री के बाद प्रधानमंत्री बनने की कोशिश
1964 में जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद प्रधानमंत्री पद के लिए मोरारजी देसाई को एक प्रमुख दावेदार माना जा रहा था। हालांकि, कांग्रेस के भीतर हुए विचार-विमर्श के बाद लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने। जनवरी 1966 में शास्त्री के निधन के बाद एक बार फिर प्रधानमंत्री पद के लिए मुकाबला हुआ। इस बार देसाई का सामना इंदिरा गांधी से था। देसाई खुद को प्रधानमंत्री पद का मजबूत दावेदार मानते थे, लेकिन कांग्रेस संसदीय दल के चुनाव में इंदिरा गांधी को समर्थन मिला और वह प्रधानमंत्री बन गईं। इंदिरा गांधी के साथ देसाई के मतभेद आगे भी बने रहे। नवंबर 1969 में कांग्रेस के विभाजन के बाद वह इंदिरा गांधी के विरोधी खेमे कांग्रेस संगठन के साथ रहे। 1970 के दशक में वह विपक्ष की राजनीति में सक्रिय हुए और इंदिरा गांधी की सरकार के खिलाफ खड़े नेताओं में शामिल हो गए।

इमरजेंसी के बाद जनता पार्टी की जीत और प्रधानमंत्री पद
जून 1975 में देश में आपातकाल लागू होने के बाद विपक्षी नेताओं के खिलाफ कार्रवाई हुई। मोरारजी देसाई को भी हिरासत में रखा गया। मार्च 1977 में लोकसभा चुनाव हुए तो इंदिरा गांधी की कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा और जनता पार्टी ने जीत हासिल की। चुनाव के बाद प्रधानमंत्री पद के लिए मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह और जगजीवन राम के नाम चर्चा में थे। इस दौरान जयप्रकाश नारायण और आचार्य कृपलानी जैसे वरिष्ठ नेताओं के समर्थन ने देसाई के पक्ष में माहौल बनाया। अंततः 24 मार्च 1977 को उन्होंने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। वह भारत के पहले ऐसे प्रधानमंत्री बने, जिनकी सरकार कांग्रेस के बाहर बनी थी। उनकी सरकार ने आपातकाल के दौरान हुए घटनाक्रमों की समीक्षा और लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने पर जोर दिया। हालांकि, जनता पार्टी के भीतर विचारधारात्मक मतभेद और नेतृत्व को लेकर खींचतान बढ़ती गई। चौधरी चरण सिंह के साथ उनके मतभेद भी गहराते गए। आखिरकार जुलाई 1979 में मोरारजी देसाई ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। इस तरह उनका कार्यकाल करीब दो साल चार महीने चला।

पाकिस्तान ने क्यों दिया निशान-ए-पाकिस्तान?
मोरारजी देसाई को पाकिस्तान का सर्वोच्च नागरिक सम्मान निशान-ए-पाकिस्तान दिए जाने के पीछे भारत-पाकिस्तान संबंधों को बेहतर बनाने की कोशिश को एक महत्वपूर्ण संदर्भ माना जाता है। उनके प्रधानमंत्री रहते दोनों देशों के बीच संवाद और तनाव कम करने की कोशिशें हुई थीं। देसाई ने भी भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध सामान्य करने की जरूरत पर जोर दिया था। उनकी विदेश नीति में पड़ोसी देशों के साथ बातचीत और आपसी संबंध सुधारने की कोशिश शामिल थी। पाकिस्तान की ओर से उन्हें सम्मानित करने के फैसले को इसी पृष्ठभूमि में देखा जाता है। हालांकि, इस सम्मान के पीछे केवल एक वजह होने का दावा करना सही नहीं होगा। उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी से यह निर्णायक रूप से साबित नहीं होता कि पाकिस्तान ने उन्हें किसी एक विशेष घटना के कारण यह सम्मान दिया था।

कहुंटा परमाणु केंद्र और रॉ एजेंट्स से जुड़ा विवाद
मोरारजी देसाई के पाकिस्तान से संबंधों को लेकर सबसे चर्चित विवाद पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम और वहां भारतीय खुफिया नेटवर्क से जुड़ा है। इस कहानी के अनुसार, देसाई को पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम की जानकारी थी और उन्होंने तत्कालीन पाकिस्तानी सैन्य शासक जनरल जिया-उल-हक से बातचीत के दौरान इसका संकेत दिया था। कुछ दावों में यह भी कहा गया कि इसके बाद पाकिस्तान में सक्रिय भारतीय खुफिया नेटवर्क को नुकसान पहुंचा। एक अन्य चर्चित दावे में कहा जाता है कि देसाई ने पाकिस्तान के परमाणु ठिकानों पर हमले के लिए इजराइल को भारतीय जमीन का इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी थी। लेकिन इन घटनाओं को निशान-ए-पाकिस्तान दिए जाने से सीधे जोड़ने के लिए पर्याप्त पुष्ट प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। इस मामले में रक्षा और रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञों ने भी अलग-अलग दृष्टिकोण रखे हैं। इसलिए यह कहना कि मोरारजी देसाई की किसी एक बातचीत के कारण रॉ एजेंट्स मारे गए या पाकिस्तान ने उन्हें इसी वजह से सर्वोच्च सम्मान दिया, स्थापित तथ्य के रूप में पेश नहीं किया जा सकता।

भारत रत्न पाने वाले भी इकलौते भारतीय नेता
मोरारजी देसाई को वर्ष 1991 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया। इससे पहले पाकिस्तान ने भी उन्हें अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान निशान-ए-पाकिस्तान से नवाजा था। इस तरह वह दोनों देशों के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से सम्मानित होने वाले विशिष्ट भारतीय नेताओं में शामिल हुए। भारत रत्न मिलने के पीछे स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिका, सार्वजनिक जीवन में योगदान और देश के प्रधानमंत्री के रूप में उनकी सेवाएं महत्वपूर्ण थीं। 10 अप्रैल 1995 को मुंबई में 99 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। मोरारजी देसाई का राजनीतिक जीवन प्रशासनिक सेवा, स्वतंत्रता संग्राम, कांग्रेस के भीतर संघर्ष, विपक्ष की राजनीति और गैर-कांग्रेसी सरकार के नेतृत्व तक फैला रहा। पाकिस्तान से मिला सम्मान उनके जीवन का चर्चित अध्याय जरूर है, लेकिन उसके पीछे की हर कहानी को प्रमाणित इतिहास और अपुष्ट दावों के अंतर के साथ देखना जरूरी है।

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Sushant Pratap Singh Sushant Pratap Singh is an Indian content creator, video producer, and media professional known for creating political explainer videos, digital journalism content, and social media campaigns. He has worked with UP News Network and specializes in video production, content writing, and social media management. Sushant Pratap Singh began his media career as a content creator and video producer associated with UP News Network. During his professional journey, he worked on political and social explainer content, digital journalism, and social media engagement. He has experience in producing and editing news videos, writing articles for digital platforms, and managing online audience engagement through social media strategies. His work also includes anchoring, on-camera presentation, and graphic design for digital media content. Skills-: Content Writing and Article Writing | Social Media Management | Anchoring and Presentation | Video Editing using Adobe Premiere Pro | Video Production | Graphic Design using Canva | Political and Social Explainer Content