मुरादाबाद में इंसानियत की मिसाल, मुस्लिम समुदाय ने किया हिंदू बुजुर्ग का अंतिम संस्कार
मुरादाबाद के अगवानपुर में मुस्लिम समुदाय ने एक हिंदू बुजुर्ग का अंतिम संस्कार कर इंसानियत की मिसाल पेश की। परिवार ने साथ नहीं दिया तो स्थानीय लोगों ने आगे बढ़कर जिम्मेदारी निभाई। इस घटना ने गंगा-जमुनी तहजीब और मानवता का सच्चा संदेश समाज को दिया।
Uttar Pradesh News: उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले के अगवानपुर नगर पंचायत से इंसानियत और सांप्रदायिक सौहार्द की एक भावुक कहानी सामने आई है। यहां 76 वर्षीय तेजपाल सिंह के निधन के बाद उनके अपने सगे संबंधियों ने अंतिम संस्कार से मुंह मोड़ लिया, लेकिन स्थानीय मुस्लिम समुदाय और हिंदू युवाओं ने मिलकर उनकी अंतिम विदाई की। यह घटना ऐसे समय में सामने आई है जब समाज में मानवीय मूल्यों के गिरने की बातें होती हैं। इस पहल ने गंगा-जमुनी तहजीब की एक नई मिसाल पेश की है और लोगों को इंसानियत का असली मतलब समझाया है।
परिवार ने छोड़ा साथ, आसिफ बना सहारा
तेजपाल सिंह मूल रूप से बिजनौर के रहने वाले थे और पेपर मिल में इलेक्ट्रिशियन के तौर पर काम करते थे। साल 1997 में एक हादसे के बाद वे दिव्यांग हो गए थे। इसके बाद उनके जीवन में मुश्किलें बढ़ती चली गईं। पारिवारिक विवाद के चलते पत्नी और इकलौती बेटी से उनका रिश्ता टूट गया और वे अकेले पड़ गए। ऐसे समय में आसिफ नाम के व्यक्ति और उनके परिवार ने उन्हें सहारा दिया। पिछले 15 वर्षों से आसिफ का परिवार बिना किसी स्वार्थ के उनके खाने-पीने और दवाइयों का ध्यान रख रहा था।
मौत के बाद भी अपनों ने नहीं दिया साथ
तेजपाल सिंह के निधन के बाद पुलिस ने उनकी पूर्व पत्नी और पैतृक गांव बिजनौर में सूचना दी। लेकिन उनकी पत्नी ने तलाक का हवाला देते हुए आने से इनकार कर दिया। ऐसे में अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी पूरी तरह स्थानीय लोगों पर आ गई।
मुस्लिम समुदाय ने निभाया इंसानियत का फर्ज
अगवानपुर के मुस्लिम भाइयों ने आपस में चंदा इकट्ठा कर अंतिम संस्कार की सभी सामग्री जुटाई। इसके बाद हिंदू रीति-रिवाज से उनकी अर्थी को कंधा दिया गया। श्मशान घाट की सुविधा न होने के बावजूद रामगंगा नदी के किनारे उनका अंतिम संस्कार किया गया, जहां एक युवक मोनू ने उन्हें मुखाग्नि दी। यह घटना बताती है कि इंसानियत धर्म से कहीं ऊपर होती है।
2011 से जुड़ा था आसिफ और तेजपाल का रिश्ता
तेजपाल और आसिफ का रिश्ता साल 2011 में शुरू हुआ था, जब तेजपाल ने अपना घर आसिफ को बेच दिया था। कुछ समय बाद वे फिर उसी घर में लौट आए और वहीं रहने की इच्छा जताई। उन्होंने अपनी आखिरी सांस भी उसी घर में लेने और वहीं से अंतिम यात्रा निकलने की बात कही थी। आसिफ ने बड़ी दिलदारी दिखाते हुए उन्हें रहने दिया और अपने परिवार को उनकी सेवा में लगा दिया।
छोटे बेटे अमान ने निभाई बड़ी जिम्मेदारी
आसिफ का 10 साल का बेटा अमान रोज तेजपाल के लिए खाना लेकर जाता था। जिस दिन वह खाना लेकर पहुंचा, दरवाजा नहीं खुला, तभी इस दुखद घटना का पता चला। इस परिवार का यह व्यवहार आज के समय में बहुत ही दुर्लभ और सराहनीय माना जा रहा है।
श्मशान घाट की कमी पर उठे सवाल
इस घटना के बीच अगवानपुर में श्मशान घाट की कमी का मुद्दा भी सामने आया है। स्थानीय लोगों और रामलीला कमेटी के पदाधिकारियों ने नाराजगी जताई कि इलाके में हिंदू समाज के लिए कोई व्यवस्थित श्मशान घाट नहीं है। अंतिम संस्कार के दौरान लोगों को ऊबड़-खाबड़ जमीन पर क्रिया-कर्म करना पड़ा। लोगों का आरोप है कि सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे हैं, लेकिन श्मशान के लिए भूमि आवंटित नहीं हो रही। कई बार बजट आने के बावजूद वापस चला गया। अब लोगों ने प्रशासन से इस दिशा में ठोस कदम उठाने की मांग की है।
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