पिता की मौत के बाद गरीबी में इस लड़के को मां के साथ गांव की सड़कों पर चूड़ियां बेच गुजारा करना पड़ा। उस दौरान लोग मजाक उड़ाते थे ताने देते थे

नई दिल्ली. बाधाएं कब बांध सकी हैं आगे बढ़ने वाले को, विपदाएं कब रोक सकी हैं लड़कर जीने वाले को... इसका मतलब है कि बड़ी से बड़ी परेशानियां इंसान के जज्बे के आगे बौनी साबित होती हैं। आज हम बात कर रहे हैं ऐसे दिव्यांग शख्स की जो कभी अपनी विधवा मां के साथ सड़कों पर घूमकर चूड़ी बेचता था, पर अपने मजबूत इरादों से वो अफसर बनकर ही माना। पिता की मौत के बाद गरीबी में इस लड़के को मां के साथ गांव की सड़कों पर चूड़ियां बेच गुजारा करना पड़ा। उस दौरान लोग मजाक उड़ाते थे ताने देते थे। लेकिन लोगों के यही ताने उसका हौसला बने और उसने ठान लिया की अब वह अफसर बनकर ही मानेगा।

IAS रमेश घोलप उन युवाओं के लिए प्रेरणाश्रोत  हैं जो सिविल सर्विसेज में भर्ती होना चाहते हैं। रमेश को बचपन में बाएं पैर में पोलियो हो गया था और परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि रमेश को अपनी मां के साथ सड़कों पर चूड़ियां बेचना पड़ा था। लेकिन रमेश ने हर मुश्किल को मात दी और आई ए एस (IAS) अफसर बनकर दिखाया। 

रमेश के पिता की एक छोटी सी साईकिल की दुकान थी। पिता को शराब पीने की आदत ने इस परिवार को सड़क पर लाकर खड़ा कर दिया। इधर ज्यादा शराब पीने की वजह से इनके पिता अस्पताल में भर्ती हो गए और उनका निधन हो गया। अब परिवार की सारी जिम्मेदारी रमेश की मां पर आ पड़ी।  

मां बेचारी सड़कों पर चूड़ियां बेचने लगी, रमेश के बाएं पैर में पोलियो हो गया था लेकिन हालात ऐसे थे कि रमेश को भी मां के साथ चूड़ियां बेचने का काम करना पड़ा। वर्ष 2005 में रमेश 12 वीं कक्षा में थे तब उनके स्कूल से अपने घर जाने में बस से 7 रुपये लगते थे लेकिन विकलांग होने की वजह से रमेश का केवल 2 रुपये किराया लगता था लेकिन रमेश के पास उस समय 2 रुपये भी नहीं होते थे।

रमेश ने 12 वीं में 88.5 % नंबरों से परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद इन्होंने शिक्षा में एक डिप्लोमा कर लिया और गाँव के ही एक विद्यालय में शिक्षक बन गए। डिप्लोमा करने के साथ ही रमेश ने बी ए की डिग्री भी ले ली। शिक्षक बनकर रमेश अपने परिवार का खर्चा चला रहे थे लेकिन उनका लक्ष्य कुछ और ही था। 

रमेश ने छह महीने के लिए नौकरी छोड़ दी और मन से पढाई करके 2010 में  UPSC की परीक्षा दी लेकिन में उन्हें सफलता नहीं मिली। मां ने गांव वालों से कुछ पैसे उधार लिए जिससे रमेश पुणे जाकर सिविल सर्विसेज के लिए पढाई करने लगे। 

आखिर 2012 में रमेश की मेहनत रंग लायी और रमेश ने यूपीएससी की परीक्षा 287 वीं रैंक हासिल की। और इस तरह बिना किसी कोचिंग का सहारा लिए, अनपढ़ मां बाप का बेटा आई ए एस (IAS) अफसर बन गया था। रमेश झारखण्ड कैडर के IAS हैं और कई जिलों में बतौर कलेक्टर और डिप्टी कलेक्टर तैनात रहे हैं।

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