निरीश मध्य प्रदेश के भिंड जिले के महु गाँव के रहने वाले हैं। निरीश का बचपन से IAS बनने तक का सफर गरीबी में ही गुज़रा। उनके पिताजी सिलाई का काम कर के पाँच लोगों के परिवार का पेट भरते थे। निरीश अपने परिवार के साथ महज 15 बाई 40 फीट के छोटे से मकान में रहते थे। परिवार की तंग आर्थिक हालत के कारण निरीश ने गाँव के ही सरकारी स्कूल से पढ़ाई की।

लखनऊ. क्या हार में क्या जीत में, किंचित नहीं भयभीत मैं, संघर्ष पथ पर जो मिले, यह भी सही वही भी सही। कवि शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ की ये लाइनें उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा श्रोत हैं जो मुश्किल हालातों में अपने लक्ष्य से भटक जाते हैं। अपनी ख़ास सीरीज 'शख्सियत' में आज हम जिस शख्स की बात करने जा रहे हैं उनके ऊपर ये लाइनें बिलकुल सटीक बैठती हैं। आज हम आपको बताने जा रहे हैं तीन बार UPSC सिविल सर्विस की परीक्षा में फेल होने के बाद 2013 की परीक्षा में 370वीं रैंक हासिल करने वाले 2013 बैच के IAS निरीश राजपूत की कहानी। निरीश के संघर्ष हर किसी के लिए प्रेरणाश्रोत हैं।

निरीश मध्य प्रदेश के भिंड जिले के महु गाँव के रहने वाले हैं। निरीश का बचपन से IAS बनने तक का सफर गरीबी में ही गुज़रा। उनके पिताजी सिलाई का काम कर के पाँच लोगों के परिवार का पेट भरते थे। निरीश अपने परिवार के साथ महज 15 बाई 40 फीट के छोटे से मकान में रहते थे। परिवार की तंग आर्थिक हालत के कारण निरीश ने गाँव के ही सरकारी स्कूल से पढ़ाई की। 

अखबार बाँट कर भरी थी कॉलेज की फीस 

नीरीश बचपन से ही पढ़ाई में काफी तेज़ थे। परन्तु पिता की कम आय के कारण उनका कॉलेज में दाखिला होना मुश्किल था। अपनी फीस के पैसे जुटाने के लिए निरीश ने सुबह उठ कर घरों में अखबार डालने का काम किया। इस नौकरी से मिले पैसों से उन्होंने ग्वालियर के एक सरकारी कॉलेज में दाखिला लिया। निरीश ने सरकारी कॉलेज से ही BSc और MSc की डिग्री हासिल की।

UPSC की तैयारी के दौरान हुआ एक बुरा अनुभव 

निरीश बताते हैं कि उनके एक दोस्त ने उत्तराखंड में नया कोचिंग इंस्टीट्यूट खोला था और उन्हें वहाँ पढ़ाने के लिए बुलाया गया। इसके बदले में उनके  दोस्त ने उनसे वादा किया कि बदले में उन्हें UPSC की तैयारी के लिए स्टडी मैटेरियल उपलब्ध कराएंगे। अपने दोस्त की बात पर विश्वास कर निरीश ने 2 साल तक इंस्टिट्यूट में पढ़ाया परन्तु प्रसिद्धि पाने के बाद निरीश के दोस्त ने उन्हें यह कहकर नौकरी से निकाल दिया कि वह एक गरीब परिवार से हैं और उनमें IAS अफसर बनने की काबिलियत नहीं है। 

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दोस्त की दगाबाजी ने भी दिया हौसला 

अपने दोस्त के बर्ताव से निरीश को निराशा ज़रूर हुई परन्तु उन्होंने अपने आत्म विश्वास को डगमगाने नहीं दिया। वह दिल्ली चले गए। दिल्ली में उनकी मुलाक़ात कई ऐसे लोगो से हुई जो उन्हीं की तरह IAS बनना चाहते थे। उन्हीं में से एक दोस्त के साथ वह मुख़र्जी नगर के छोटे से घर में किराए पर रहने लगे। निरीश के हालात इतने ख़राब थे कि उनके पास ना तो कोचिंग में दाखिला लेने के पैसे थे और ना ही किताबें खरीदने के। इसीलिए उन्होंने सारी पढ़ाई दोस्त के नोट्स पढ़ कर की। निरीश कभी अपने हालातों से डरे नहीं बल्कि एक सुखद भविष्य की चाह में कड़ी ममेहनत करते रहे। 

चौथे एटेम्पट में मिली UPSC सिविल सेवा परीक्षा में सफलता 

IAS बनने का सफर निरीश के लिए किसी चुनौती से काम नहीं रहा। तीन एटेम्पट में फेल होने के बाद जहाँ व्यक्ति सफलता की उम्मीद छोड़ देता है वहीं निरीश यह जानते थे कि परिश्रम करने के अलावा उनके पास कोई और दूसरा रास्ता नहीं था। वह सकारात्मक सोच के साथ मेहनत करते रहे और 2013 में UPSC की सिविल सेवा परीक्षा में 370वी रैंक हासिल कर IAS बन गए। 

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