नंदूरबार में 15 से 45 वर्ष की महिलाओं का साक्षरता दर बढ़कर 81 फीसदी हो गया है। जिला सूचना अधिकारी किरण मोघे बताते हैं कि प्राथमिक स्तर पर ही बेहतरीन शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए आंगनवाड़ी केंद्रों को विकसित किया जा रहा है और इसके लिए प्रशासन ने 12 लाख रुपए की राशि आवंटित की है

नेशनल डेस्क. वैश्विक महामारी कोरोना ने मानव जीवन पर गहरा प्रभाव डाला। जीवन के विविध आयामों पर कोरोना का प्रभाव ऐसा पड़ा कि मनुष्य ने अपने तौर-तरीके बदले। शिक्षा के क्षेत्र में भी बहुत परिवर्तन आया। कक्षा का स्थान ई-लर्निंग और डिजिटल क्लास ने ले लिया। यह सब शहरों के छात्रों के लिए तो संभव था जो सुविधा संपन्न हैं, जहां संचार साधनों की सुगमता है, पर महाराष्ट्र के नंदुरबार और छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा और बस्तर जिले में यह सुविधा नहीं थी। 

कोरोना की प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद इन दो राज्यों के तीन आकांक्षी जिलों ने शिक्षा के क्षेत्र में बेहतरीन प्रदर्शन किया और नीति आयोग द्वारा जारी डेल्टा रैंकिंग में शीर्ष स्थान प्राप्त किया। आकांक्षी जिले वे जिले होते हैं, जो सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े होते हैं। अब इन्हीं आकांक्षी जिलों को आगे बढ़ाने के लिए प्रशासन, शिक्षकों और ग्रामीणों ने कमर कस ली है।

छात्रों के बीच पहुंचे शिक्षक, टोली बनाकर बच्चों को पढ़ाया 

कोरोना काल में महाराष्ट्र के नंदुरबार के शिक्षकों ने मिसाल कायम की। जिले के ग्रामीण इलाकों में एक जगह सुनिश्चित कर 15 बच्चों की टोली बनाई। सप्ताह में तीन दिन निर्धारित किए और क्रम से बच्चों की टोलियों को पढ़ाया, रचनात्मक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए खेल-कूद भी किया गया। इस दौरान सामाजिक दूरी,मास्क और कोरोना से जुड़ी सभी सावधानियों का भी पालन किया गया। बच्चों के पास मोबाइल की सुविधा नहीं थी तो शिक्षक स्वयं उनके पास पहुंच गए और कोरोना काल में भी बच्चों की पढ़ाई नहीं रुकी। स्थानीय अधिकारी बताते हैं कि, बच्चों का पढ़ाई से जुड़ाव कम हो जाता तो उन्हें वापस स्कूल में लाना बेहद कठिन होता क्योंकि नंदूरबार में बच्चे कम उम्र में ही मजदूरी करने लग जाते है। ऐसे में शिक्षा की महत्ता समझाने के लिए शिक्षकों को निरंतर उनके संपर्क में रहना पड़ता है। 

नंदूरबार के विद्यालयों में समग्र विकास पर जोर 

आकांक्षी जिले नंदूरबार के जिला प्रशासन ने विद्यालयों के उन्नयन पर बहुत बल दिया है। छात्रों का ड्रॉपआउट रेट कम हुआ और एक कक्षा से दूसरे कक्षा में प्रवेश लेने वाले छात्रों की संख्या में वृद्धि हुई है। जिले में पांचवीं से छंठवी कक्षा में जाने वाले बच्चों का प्रतिशत 99.56 है। 98.3% छात्र ऐसे हैं, जो 8 वीं से 9 वीं कक्षा में प्रवेश लिए हैं। नंदूरबार के विद्यालय की कक्षाओं में छात्र-शिक्षक अनुपात 98 फीसदी है। जिले के 384 स्कूलों में सोलर डिजिटल मैकेनिज्म बनाया गया है। बालिका शौचालय और गुणवत्तापूर्ण पेयजल की व्यवस्था स्कूलों में की गई है। नंदूरबार में 15 से 45 वर्ष की महिलाओं का साक्षरता दर बढ़कर 81 फीसदी हो गया है। जिला सूचना अधिकारी किरण मोघे बताते हैं कि प्राथमिक स्तर पर ही बेहतरीन शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए आंगनवाड़ी केंद्रों को विकसित किया जा रहा है और इसके लिए प्रशासन ने 12 लाख रुपए की राशि आवंटित की है। इससे आंगनवाड़ी का नया भवन और बाकी सब सुविधाएं दी जाएंगी। 

मोहल्ला क्लास और बेहतर अवसंरचना से दंतेवाड़ा को मिली अच्छी रैंकिंग 

छत्तीसगढ़ का सुदूर दंतेवाड़ा जिला भी आकांक्षी जिलों में आता है। नीति आयोग द्वारा जारी रैंकिंग में जिले को तीसरा स्थान मिला है। दंतेवाड़ा, राज्य की राजधानी रायपुर से लगभग 400 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। नेटवर्क की समस्या यहां भी बनी रहती है। कोरोना काल में बच्चों की शिक्षा बाधित न हो इसीलिए यहां भी मोहल्ला क्लास का संचालन किया गया। गांव के अलग - अलग पारे में जाकर शिक्षकों ने छात्रों को पढ़ाया। जिला शिक्षा अधिकारी राजेश कर्मा बताते हैं कि जिले के विद्यालय, नीति आयोग द्वारा जारी सभी मानकों जैसे कि, प्रवेश दर, छात्र-शिक्षक अनुपात और बुनियादी अवसरंचना इत्यादि पर बेहतर प्रदर्शन किया है। कोरोनाकाल में भी शिक्षा बाधित नहीं हुई। यही सब कारण है कि जिले के को नीति आयोग द्वारा जारी रैंकिंग में अच्छा स्थान मिला है।